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गहराता भू-जल संकट : Deepening ground water crisis |

 Deepening ground water crisis


देश में निरंतर भू-जल संकट बढ़ता जा रहा है। कभी पंजाब और हरियाणा इस मामले में चर्चित थे, क्योंकि जहां धान की बिजाई के लिए भू-जल का बड़े स्तर पर प्रयोग हो रहा 'है, लेकिन अब बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जल संकट से जूझ रहे हैं। बिहार के 24 जिलों में जल स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। इसी तरह राजस्थान के कोटा क्षेत्र में विगत पांच वर्षों में जल स्तर 25 फुट गिरना बताया जा रहा है। झारखंड के हालात तो और भी विकट हैं, जहां प्रत्येक वर्ष 100 फुट से भी ज्यादा पानी नीचे जा रहा। है। वास्तव में उत्तर भारत बुरी तरह से जल संकट का सामना कर रहा है। 








झारखंड जैसे राज्यों में पीने योग्य पानी की गंभीर किल्लत बनी हुई है। बड़ी समस्या यह है कि एक तरफ उत्तर भारत के कुछ राज्य जल संकट से त्रस्त हैं वहीं दूसरी तरफ पंजाब-हरियाणा सहित अन्य राज्यों में धान की खेती को बल दिया जा रहा है। यदि धान की खेती यूँ हो जारी रही तो वो दिन दूर नहीं जब पीने के लिए भी पानी नहीं बचेगा। यह आवश्यक है कि सरकार धान की खेती की बजाए कम पानी वाली फसलों की बिजाई के लिए एक क्रांति के रूप में कार्य करे। मक्की सहित अन्य फसलों की बिजाई के लिए किसानों को सस्ती दरों में बीज उपलब्ध करवाए जाएं और फसलों के मंडीकरण का उचित प्रबंध किया जाए। किसानों ने विगत वर्षों में धान, मक्की व अन्य फसलों को अपनाया था लेकिन उचित कीमतें नहीं मिलने और मंडीकरण न होने के कारण परेशान हुए किसान वापिस धान की तरफ लौट आए। पंजाब के किसानों ने गुलाब व सब्जियों की खेती शुरु की थी, लेकिन इस बार शिमला मिर्च मात्र 2 से 3 रुपये किलो तक बिकी, जिससे किसानों ने भविष्य में इसकी खेती करने से तौबा कर दी। यदि हालात यही रहे तो जल संकट से निपटना आसान नहीं पानी की घरेलू बचत भी आवश्यक है, साथ ही धान जैसी फसल की बिजाई को भी कम करना होगा।









 फैक्ट्रियों में पानी की पुनः उपयोग पर बल देना होगा। तकनीक भी इस दिशा में बेहतर भूमिका निभा सकती है। इसके साथ ही सरकार किसानों तक तकनीकी जानकारी पहुंचाने का प्रबंध करे। किसानों की सोच बदलनी होगी। भले ही राज्य सरकारों द्वारा बड़े स्तर पर किसान मेले लगाए जा रहे हैं लेकिन इन मेलों में पहुंचने वाले किसानों का ध्यान कम पानी वाली फसलों की बिजाई करने की बजाए गेहूं धान के अत्याधिक झाड़ वाले बीजों की खरीद तक सीमित होता है। बहुत कम व्यक्ति हैं, जो कृषि विशेषज्ञों के उन भाषणों की तरफ ध्यान देते हैं। यह बात समझनी आसान नहीं कि पानी रहेगा तो खेती रहेगी। यदि प्रकृति के सीमित संसाधनों की तरफ ध्यान नहीं दिया तो कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी। पानी की बचत के लिए बड़े स्तर पर प्रयास करने होंगे, लेकिन पानी के संबंध में लापरवाही भरे रवैये को त्यागने की आवश्यकता है।



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